पटना सिटी (न्यूज़ सिटी)। जदयू विधायक ललन पासवान का प्रेस नोट जारी कहा की सुप्रीम कोर्ट के द्वारा अनुसूचित जाति व जनजाति के आरक्षण पर दिए गए ...
पटना सिटी (न्यूज़ सिटी)। जदयू विधायक ललन पासवान का प्रेस नोट जारी कहा की सुप्रीम कोर्ट के द्वारा अनुसूचित जाति व जनजाति के आरक्षण पर दिए गए फैसले आश्चर्यजनक और दुर्भाग्यपूर्ण है। भारत के पवित्र लोकतंत्र में भारत का संविधान बड़ा है कि न्यायपालिका ? भारत के प्रधानमंत्री को भी स्पष्ट करना चाहिए कि भारतीय संविधान के अंदर न्यायपालिका है, या न्यायपालिका के अंदर संविधान ? पिछले दिनों इसी तरह SC/ST एक्ट पर फैसले आये थे, जिसे लोकसभा में संसोधन बिल लाकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया गया था।
विधायिका की परिभाषा तो पहले ही परिभाषित है, विधायिका सर्वोपरि है ! लेकिन इसके बाबजूद न्यायपालिका द्वारा अनुसूचित जाति व जनजाति के आरक्षण पर विवादित फैसले सुनाकर देश मे विद्रोह कराने की कोशिश कर जा रही है। बीते 02 अप्रैल 2018 को पूरे देश के दलितों के आक्रोश को देखने के वाबजूद दलितों के आरक्षण पर तलवार चढ़ाना, न्यायपालिका का यह निर्णय न्याय संगत नही है। क्रीमीलेयर की चर्चा तब होती जब भारत का गैर बराबरी समाप्त हो जाता।

1947 से लेकर आज तक मात्र 06 प्रतिशत आरक्षण का लाभ दलितों को मिला है। विधायिका में सांसद विधायक एवं तथाकतिथ दलित नेताओ व मात्र 06 प्रतिशत केंद्रीय सेवा के नौकरियों में आने से 30 करोड़ दलितों के गैर वरवरी अभी तक खत्म नहीं हुई ! देश के सत्तर करोड़ गरीब दलित शोषित, मजलूम लोग आज भी 20 रुपये के दैनिक मजदूरी पर अपना पेट पालते है। आज भी मुशहरी में पेट भरने के लिए झाड़ू और बढ़नी की प्रथा खत्म नही हुई है। शिक्षा के मामले में आजादी के 72 साल बीतने के बाद भी बिहार मेंदलित महिलाओं का साक्षरता दर 14 प्रतिशत और पुरुषों का 21 प्रतिशत है। इस तरह शत प्रतिशत साक्षरता के लिये महिलाओं को तीन सौ साल तथा पुरुषों को दो सौ साल इंतज़ार करना पड़ेगा।
न्यायपालिका आज तक आरक्षण के बकाए कोटे को भरने के लिय कोइ आदेश केंद्र व राज्यसरकार को नही दिया है। बाबा साहेब अंबेडकर ने दस वर्षो के लिये आरक्षण संविधान में लागू किया था। आज 72 वर्षों में सत्ता शीर्ष पर आसीन रहे। सभी दलों के नेताओं ने आरक्षण को पूरा करके दलितों की आर्थिक स्थिति और सामाजिक विषमता को क्यो नही खत्म किया, इसके लिये जिम्मेवार कौन है ? इस पर न्यायपालिका ने आज़ादी के बाद से अभी तक संज्ञान क्यो नही लिया। भारत के संविधान में अब तक सैकड़ों संसोधन हुए,क्यो नही आरक्षण को नौंवी सूची में डाल दिया गया ? अगर न्यायपालिका में अनुसूचित जाति जनजाति के लिये आरक्षण लागू कर दिया गया होता तो इस तरह के फैसले एस सी और एस टी के खिलाफ नही आता। भारतीय संबिधान के अनुच्छेद संख्या 22/1955 में बाबा साहेब अंबेडकर ने अस्पृश्यता (छुआछूत) के आधार पर अनुसूचित जाति जन-जाति को आरक्षणदिया है, न कि आर्थिक आधार पर। आर्थिक आधार पर तो देश मे अभी प्रधानमंत्री जी द्वारा सामान्य जातियों व धर्म के लोगों को आरक्षण का लाभ प्रदत है। जबतक SC/ST के साथ छुआ -छूत का भेदभाव भारत में रहेगा तो क्रीमीलेयर की बात बेमानी है।



